"अधूरा सफ़र"
कल अचानक सफऱ करने का मन किया। तो सोचा छुट्टियां भी हैं और बहुत दिनों से दोस्तों से भी नहीं मिले हैं। तो फिर हम बैग में कुछ कपड़े रखे ,ब्रश, हेडफोन, चार्जर, मास्क, गर्मी से बचने के लिए गमछा और सबसे जरूरी चीज हमारी प्रिय डायरी साथ में दो पेन आदि सामान रख। हम शाम को ही सफ़र के बहाने दोस्तों के पास निकल चले।
घर के पास से बस स्टैंड के लिए ऑटो लिया। बस स्टैंड पहुंचने के बाद बस देखी। तो बस सामने ही खड़ी थी। जहाँ पर हमें जाना था। हम बस में चढ़े। तकरीबन उसमें दस यात्री थे। क्योंकि अभी बस को चलने में समय था। हम इधर-उधर देखे। सीटें ज्यादा खाली थीं। तो अपने अनुसार लेने में दिक्कत नहीं हुई। तो हमने ड्राइवर की तरफ की तीसरी सीट ली। जिधर तीन सवारी बैठती हैं। और हम खिड़की की तरफ बैठ गए।
इतने में एक लड़की बस में चढ़ती है। इधर-उधर देखती है। तो फिर वह हमारे पास आकर बोली। आपके पास कोई बैठा है क्या?
इतने में हमारी थोड़ी धड़कन तेज सी हुईं। हम धीरे से बोले नहीं जी कोई नहीं । फिर वो हमारे पास वाली सीट पर बैठ गयी। उसने काली जीन्स जो आजकल थोड़ी नीचे से ऊंची वाली आ रहीं हैं। वैसे साधारण थी। जैसे आजकल रहती हैं कटी-फ़टी वाली। और ऊपर हाफ बाजू की टीशर्ट हल्के हरे रंग की व एक पीछे बैग लटकाए हई थी।
ताज्जुब की बात ये थी। हम खुद लोवर टीशर्ट में थे। और हमने जिस रंग की टीशर्ट पहन रखी थी। उनकी भी उसी रंग की थी।
उसने अपनी पीठ से बैग उतारा और आगे अपनी टांगों पर रख। जीज तरह हमने रखा हुआ था। मगर हमारा सारा ध्यान खिड़की से बाहर था। सफर में हमको बाहर खेत-खलियान देखना बहुत पसन्द हैं। बस भी तेज चल रही थी। उससे तेज हवा चल रही थी। मगर अब हमारी धड़कनें नॉर्मल थी। अब हवा की वजह से पास बैठी लड़की की ज़ुल्फ़ें उड़ रहीं थीं। जो कई बार हमसे टकरा चुकी थीं। तभी हमारे मन में ख्याल आया।
कुछ लिख लें। फिर सोचा अभी रहने देते बाद में लिखेंगे।
हम उनसे पूछना चाह रहे थे। कि खिड़की बन्द कर दें क्या?
मगर हिम्मत नहीं हो पा रही थी। ऊपर से गर्मी भी बहुत थी। तकरीबन 45 डिग्री तापमान था।
हमने हिम्मत कर पूछ ही लिया। अगर आपको खिड़की से आती हवा से कोई परेशानी हो तो क्या खिड़की बन्द कर दें?
वो बहुत ही आहिस्ता से बोली नहीं जी कोई परेशानी नहीं है।
हमको पता है आप इसलिए कह रहे हो। हमारे बाल जो आपको परेशान कर रहे हैं(मुस्कुराते हुए बोली)
हम बोले जी ऐसी तो कोई बात नहीं है।
बोली लो चलो हम इनको अभी बांध लेते हैं।
हम बोले - खिली ज़ुल्फ़ें भी आप पर बहुत जचती हैं। वो बोली बस इतनी तारीफ मत करो।
फिर उसने अपनी कॉलर ब्लूटूथ ऑन की कानों में लगाई। और शायद किसी अप्प पर वीडियो देखने लगी। फिर हम बाहर खिड़की की तरफ खेत-खलियान देखने लगे। इतने में कंडक्टर साहब जी आते हैं। पहले उन्होंने टिकिट लिया फिर हमने। पता चला दोनों को ही अंतिम बस स्टैंड पर ही उतरना है। हम सोचने लगे। उतरने के बाद इनसे थोडी देर बात करेंगे। इंस्टाग्राम एकाउंट पूछ लेंगें बात करने के आदि तरफ -तरह के विचार आ रहे थे। फिर हम सोच से बाहर आये। कंडक्टर साहब जी आगे चले गए। दोनों टिकिट बकाया पैसे लिखकर कंडक्टर साहब ने उनको ही दे दिए। शायद कंडक्टर साहब भी बातें करवाने के लिए ऐसा किये होंगे ताकि शुरुआत तो हो। मगर उनको तो काम बहुत रहता तो वो भी समय की वैल्यू को समझते हैं। पास बैठी लड़की ने हमको हमारा टिकिट हमको दे दिया और अपना अपने बैग की ऊपर वाली जेब में रख लिया। हमने भी इसी तरह कर टिकिट सुरक्षित रख किया।
अब हम सफर में शांत थे। मगर मन में तो बहुत सारे सवाल चल रहे थे। कि इनसे ये बात कर लें ये बात कर लें। मगर बात शुरू में ही हुईं जब ज़ुल्फ़ें उड़ रहीं थीं। हम बाहर देख रहे थे। जैसे ही हमने बस के अंदर की तरफ देखने को चले तो पास बैठी लड़की हमको देखना चाह रही थी। मगर उन्होंने निगाह हटा ली। अब मन तो हमारा भी था कि हम पहले देख लें। मगर हम भी कुछ ज्यादा ही अहम में थे। कि ये ही देखें हम क्यों देखें।
फिर एक बार अचानक ये दर्शय हुआ कि दोनों की एक साथ निगाह मिल ही गयी। फिर अचानक से। दोनों ने निगाह हटा ली। उधर शायद वो सोचने लगी।इधर हम सोचने लगे।
कि इनसे पूछ लें क्या आपको कविता, कहानी पढ़ने का शौक है। अगर है तो हम एक किताब लिख रहे जिसमें सिर्फ प्रेम की कविताएं हैं।
किताब का नाम- 'बहते जज़्बात' है।
मगर हम सोच में ही मगन हो रहे थे। इतने में कंडक्टर साहब ने आवाज लगाई। अपने-अपने बकाया पैसे ले लो। पास बैठी लड़की ने अपना टिकिट निकाला और बकाया पैसे ले लिए। अब हम सोचने लगे हम भी इनसे ही कहकर बकाया पैसे कंडक्टर साहब से ले लें। तो ऐसा ही किया।
बोले कुछ नहीं उनको टिकिट दे दिए। जिधर बकाया पैसे लिखे हुए थे। उन्होंने पैसे लेकर हमें दे दिए। और हमने धन्यवाद तक नहीं किया। पता नहीं हमको काहे की शरम आ रही थी।
हम सोचने लगे। जब बस स्टैंड पर उतरेंगे। तब इनसे बोल देंगे।
अब बस स्टैंड आने में बीस मिनट बचे थे। इतने में लड़की को नींद आ गई और वो सो गई। इतने में हमारे मोबाइल में दोस्त का msg आया बोला कहाँ हैं। हम बोले बीस मिनट लग जाएंगे। बोला ठीक है। मैं बस स्टैंड पर ही मिलूँगा। हम बोले ठीक है।
अब बस स्टैंड आने में पाँच मिनट बची थीं। और वो पास बैठी लड़की अभी तक सो रही थी। हम बोले इनको कैसे जगाएं। जगाएं भी के न जगाएं इसी कशमकश में हमने उनकी कलाई पर आहिस्ता से हाथ लगाया और बोले उठ जाओ जी बस स्टैंड आने वाला है।
वो अचानक से जैसे उठी तेजी से बोली अच्छा जी। हम बोले हां जी।
बस ,बस स्टैंड पर पहुँच गयी। सभी सवारी एक-एक कर उतरने लगीं। फिर वो लड़की उतरने लगी इतने में एक सज्जन उनके पीछे आ गए। हम उनके पीछे हो गए। हम सोचने लगे कहीं ये चली न जाये। कुछ बात कर लेंगे।
वो बस से उतर गई। फिर हम भी उतर गए।
अब वो उधर की तरफ जाने लगी जिधर उनको जाना था। और हम भी अपने उधर चलने लगे जिधर जाना था। फोन देखा तो दोस्त का msg था। मैं आ रहा हूँ दस मिनट में। अब वो लड़की चलती रही। हम देखते रहे। हम सोचने लगे। बात तो वो भी कर सकती थी। हम ही क्यों करें।
बस सफर और लंबा चलता तो और अच्छा लगता।
कुछ बातें सफर में हों ही जातीं। इतने में हमारा दोस्त आ गया।
बोला कहाँ गुम है मैं इतनी देर से बाइक का हॉर्न बचा रहा हूँ।
हम बोले कहीं नहीं। बस एक मुलाकात,,,, अधूरी मुलाकात रह गयी।
बोला अच्छा कवि जी।
चलो अब रूम पर।
हम फिर उसके साथ उसके रूम पर चले गए।
🥰🥰🥰🥰🥰
- अनूप बसर ✍️🚌
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धन्यवाद🥰🙏
सभी स्वस्थ रहो
खुश रहो।
मिलते हैं फिर एक और कहानी के साथ।
🥰🥰🙏








































